कहानी 108 वर्ष पुराने मैसूर सैंडल साबुन की, विश्व युद्ध I के कारण हुई थी शुरुआत
पहले मैसूर (कर्नाटक) से चंदन की लकड़ी जर्मनी, फ्रांस समेत यूरोप में एक्सपोर्ट होती थीं लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद आयात रुका जिससे चंदन की लकड़ियों का ढेर लगने लगा। तत्कालीन मैसूर महाराज ने अपने दीवान व भारत रत्न एम विश्वेश्वरैया से कहकर 1916 में चंदन से ये साबुन बनवाए थे। शुरू में यह साबुन केवल महाराज लगाते थे।